घर में चूल्हा नहीं जलता, फिर भी कोई भूखा नहीं जानिए चांदनकी गांव की कहानी

in #chandanki2 months ago

लेखिका- प्रकृति त्रिपाठी

आज जहां ज़िंदगी मानो दो कमरों में सिमट कर रह गई है, आधुनिकता की चकाचौंध में हम अपने आस-पड़ोस से भी अनजान होते जा रहे हैं, पास में कौन रहता है, यह तक पता नहीं होता और न तो लोगों के पास इतनी फ़ुरसत है कि वे एक-दूसरे का हाल-चाल ले सकें.

इतनी व्यस्तता से भरे जीवन में, गुजरात के अहमदाबाद (Ahmedabad) से लगभग 100 किलोमीटर दूर एक अनोखा गांव है, ‘चांदनकी’ (Chandanki). यह गांव इन सारी आधुनिक धारणाओं को चुनौती देता है. भले ही इस गांव के बच्चे विदेशों में रहते हैं लेकिन यहां के बड़े-बुज़ुर्ग कभी अकेले नहीं होते. यहां आस-पड़ोस के लोग सिर्फ़ पड़ोसी नहीं, बल्कि एक साथ एक बड़े परिवार की तरह रहते हैं और तो और, यहां लोगों के घरों में चूल्हे नहीं जलते.

भारत का यह अनोखा गांव आज के इस मशीनी दौर में भी रिश्तों की एक अद्भुत मिसाल कायम कर रहा है.

घर में नहीं जलती रसोई, फिर कैसे खाते हैं खाना?
इस गांव की सबसे बड़ी और अनोखी खासियत यह है कि यहां किसी के भी घर में निजी रसोई या चूल्हा नहीं जलता. आप सोच रहे होंगे कि फिर यहां के लोग खाना कैसे खाते हैं?

दरअसल, यहां के लोगों की यह मान्यता है कि वे अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ रहते हैं. पूरे गांव का खाना एक ही ‘कम्युनिटी किचन’ में बनता है. इस पूरे गांव में कोई कामवाली (Maid) नहीं है. 60 से 70 साल की बुज़ुर्ग महिलाएं अपने घर का सारा काम स्वयं करती हैं, ताकि वे शारीरिक रूप से फ़िट और सक्रिय रह सकें.

इस गांव की एक और ख़ूबसूरत विशेषता यहां की साफ़-सफ़ाई है. यहां की हर गली और हर कोना बिलकुल साफ़ रहता है, क्योंकि यहां के लोग सिर्फ़ अपने घर को ही नहीं, बल्कि पूरे गांव को अपना आंगन मानते हैं.

15 साल पहले कैसे शुरू हुई यह परंपरा?
गांव के सरपंच पूनम पटेल बताते हैं कि लगभग 15 साल पहले इस अनूठी परंपरा की शुरुआत हुई थी.

उस समय गांव के लगभग 300 से ज़्यादा परिवार विदेश में जाकर बस गए थे. गांव में केवल 40–50 घरों के ही लोग बचे थे, जिनमें ज़्यादातर बुज़ुर्ग शामिल थे. ऐसे में उन बुज़ुर्गों के लिए रोज़ बाज़ार जाना, खाना बनाना और अपनी देखभाल करना काफ़ी मुश्किल हो गया था.

इसी समस्या का समाधान बनकर सामने आया ‘कम्युनिटी किचन’ का विचार. तभी से तय हुआ कि पूरे गांव के लिए एक ही जगह पर खाना बनेगा. अगर कोई बुज़ुर्ग बीमार होता है या चलने में असमर्थ होता है, तो उसका खाना सीधे उसके घर तक टिफ़िन के माध्यम से पहुंचा दिया जाता है.

खाना पहले महिलाएं खाती हैं
इस गांव की एक और अनोखी परंपरा है, जो आपको हैरान कर सकती है और समाज को एक बड़ा संदेश भी देती है.

जहां आमतौर पर कई पारंपरिक घरों में पुरुषों को पहले खाना परोसा जाता है, वहीं गुजरात के चांदनकी गांव में पहले महिलाएं खाना खाती हैं और उसके बाद पुरुष भोजन करते हैं. यह महिलाओं के प्रति सम्मान का एक अनूठा उदाहरण है.

कैसे चलता है खर्च और मैनेजमेंट?
अब सवाल यह उठता है कि यह कम्यूनिटी किचन चलता कैसे है? इतने लोगों का रोज़ खाना बनता कैसे है और इसका खर्च कौन उठाता है?

दरअसल, यह गांव मुख्य रूप से वरिष्ठ नागरिकों (Senior Citizens) का गांव है. यहां हर व्यक्ति महीने का लगभग 1500 से 2000 रुपये का योगदान देता है, जिससे यह किचन सुचारू रूप से चलता रहता है.

दिलचस्प बात यह है कि इस गांव के लगभग 300 से अधिक परिवारों के सदस्य विदेश में (NRI) रहते हैं. लेकिन विदेश रह रहे उन बच्चों को कभी यह चिंता नहीं होती कि उनके मां-बाप अकेले कैसे रह रहे होंगे, या उन्हें समय पर खाना मिल रहा होगा या नहीं. उन्हें पता है कि पूरा गांव उनके माता-पिता का परिवार है.

सुकून की असली परिभाषा और सबसे बड़ी सीख
शायद हम यह सोच भी नहीं सकते कि बिना किसी तनाव और भागदौड़ के भी जीवन इतना सुकून भरा हो सकता है. लेकिन गुजरात का चांदनकी गांव इस सोच को सच साबित करता है.

यह गांव हमें एक बहुत बड़ी सीख देता है कि असली खुशी बड़ी इमारतों या अकेले रहने में नहीं, बल्कि साथ मिलकर रहने में है.

आज हम आधुनिकता के पीछे भागते-भागते अपने ही रिश्तों से दूर होते जा रहे हैं. लेकिन यह गांव हमें याद दिलाता है कि अगर जीवन को सच में सुकून भरा बनाना है, तो हमें अपने बीच की दीवारें गिरानी होंगी और रिश्ते मज़बूत करने होंगे.

काश, देश का हर गांव और हर शहर ‘चांदनकी’ जैसा हो!

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